Ishq Kagaz ka…

यूँ तो खाली पन्ने की तासीर ,
कुछ जुदा सी होती है
खाली सी,सफेद ,रंगो से परे ,अपने मे गुम,
मीलो के मोटे मोटे गट्टों मे बंद
किसी मुकाम के इंतेज़्ज़र मे,
ये खाली पन्ने,उकता जाते है
बाँधे जाते है एक धुरी मे
रंगबिरंगी सुतलियों के सहारे
फिर समय परवान चढ़ता है
और इन्ही पन्नो की ज़िंदगी मे
दस्तक देती है, एक कलाम
जिसकी मोहोब्बत के किससे
ज़माने मे मशहूर है
आहिस्ता आहिस्ता जब स्याही
अपनी छाप छोड़ती जाती है
पन्ने को मिलता है एक मुकाम
ज़िंदगी संवार जाती है,कलम के इश्क़ मे,
स्याही की भीनी भीनी खुश्बू सुनाती है
दास्तान मुहब्बत की
जिन्हे पन्नो का ज़ायका अल्फ़ाज़ देता है
यही तो कहानी है मेरी और तुम्हारी
तुम स्याही सी छाप छोड़ जाती हो,
और मैं एक पन्ने की तरह
तुम्हारी खुश्बू मे भीग जाता हूँ…….

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Reality|असलियत

तपती दो पहर मे वो सर पार असर आता है,
डूबता है इंसान तो बस मसान नज़र आता है
ख्वाहिशे सरगोशियाँ करती है नन्हे ठिकानो पर
फूटी गुल्लाकों मे जब कलदार नज़र आता है,
रिश्तो की नौटंकी मे आपका ईस्तकबाल करता हूँ
हर मुघोटा यहा फनकार नज़र आता है
जवानी बुढ़ापा ये दौलत के किस्से फ़िज़ूल की बातें हैं
वो बचपन का आँगन जब सुनसान नज़र आता है
फट जाते है आँचल, आबरू ज़ामी डोज़ होती हैं
मिट्टी के पुतलो मे कहा इंसान नज़र आता हैं
रफ़ीक़ कई थे , बस कंधे बदल रहे थे
हर रिश्ता दो घड़ी का मेहमान नज़र आता है
दर्द मे डूबिए, इश्क़ है, ज़िंदा  कोई नही  बचा
वस्ल की राह मे जब दिल दार नज़र आता है
कोई चहेरा दिमाग़ की नसे खटखटाता है
पुरानी किताबो मे जब तन्हा  गुलाब नज़र आता है