Ishq Kagaz ka…

यूँ तो खाली पन्ने की तासीर ,
कुछ जुदा सी होती है
खाली सी,सफेद ,रंगो से परे ,अपने मे गुम,
मीलो के मोटे मोटे गट्टों मे बंद
किसी मुकाम के इंतेज़्ज़र मे,
ये खाली पन्ने,उकता जाते है
बाँधे जाते है एक धुरी मे
रंगबिरंगी सुतलियों के सहारे
फिर समय परवान चढ़ता है
और इन्ही पन्नो की ज़िंदगी मे
दस्तक देती है, एक कलाम
जिसकी मोहोब्बत के किससे
ज़माने मे मशहूर है
आहिस्ता आहिस्ता जब स्याही
अपनी छाप छोड़ती जाती है
पन्ने को मिलता है एक मुकाम
ज़िंदगी संवार जाती है,कलम के इश्क़ मे,
स्याही की भीनी भीनी खुश्बू सुनाती है
दास्तान मुहब्बत की
जिन्हे पन्नो का ज़ायका अल्फ़ाज़ देता है
यही तो कहानी है मेरी और तुम्हारी
तुम स्याही सी छाप छोड़ जाती हो,
और मैं एक पन्ने की तरह
तुम्हारी खुश्बू मे भीग जाता हूँ…….

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Tu Jahan se mila

तू जहाँ मे मिला तो जहाँ मिल गया
 गुनाह करता रहा    हूँ खुदा मिल गया
वो मिलता नही है अब ख्वाबो की तरह
नींदे उड़ गयी जब से पता मिल गया
जब आया नही जवाब   पुराने खतों   का
मुझको अश्को से भीगा रूमाल मिल गया
दिल चीज़ क्या उनसे ही पूछ ली जिए
जिन्हे खंजर लगा कर सुकून मिल गया
 किनरो से दाह करने वाले ओ समुंदर
 नदियों के इश्क़ से कों सा  खुदा मिल गया
 मोहोलत मिल गयी उन्हे भी दिल जलाने की
 क्यू सौतन के दिल को  जुनून मिल गया
 ता उमरा महफूज़ रखा आग से, तुझको
 चिंगारी से इश्क़ कर सुकून मिल गया