सरहदों का राज़ |Secret Of Boundries

रात 11 बजे शहर की गलियों में हो रही मस्ती साफ़ साफ़ बोल रही थी ।सेमीफाइनल में बांग्लादेश को हरा कर, भारत फाइनल में पहुँच  गया । और अब फाइनल में मुकाबला ,पकिस्तान से…खैर…

काफी दिन हो गए थे , डायरी में कुछ लिखा ही नहीं । कैसे लिखती ये content राइटिंग के काम में वक़्त ही नहीं मिलता। और आज जाने क्यों मैच जीतने की ख़ुशी ,किसी के हार जाने के गम से ज्यादा महसूस नहीं कर पा रही थी मैं, जैसे इस जीत में भी कुछ हार सी गयी थी मैं…

एक ऊँगली टेबल लैंप के स्विच को आँख मिचौनी के खेल में उलझा रही थी, और वही दूसरे हाथ में पेन न जाने कितने बार बंद हो कर चालू हो चूका था । इतने किस्से , कहानी लिखने वाली लड़की को आज कुछ याद नहीं आ रहा था ।  वो उस पन्ने के कोने पर लिखती है, “भारत-बांग्लादेश” मैच,और उसकी दुनिया किसी और दुनिया की सैर को हो लेती है…

कॉलेज की दीवारें किसी के स्वागत के  लिए फिर से पुतवाई गयी थी, और  हो भी क्यों न,जब बात South Asian youth festival की हो, तब युवा होने का मन सा करता है। मैं कॉलेज unit से, Festival Reporter थी तब मैं उससे मिली…वो एक अलग ही एहसास था ।मैं जिसे शायद कभी लफ़्ज़ों में नहीं लिख पाऊँगी। उसे पहली बार देखने का वो अनोखा सुख अपने आप में अकल्पनिय था ।दिल में इच्छा थी की उससे मिल सकूँ और वो पुरी भी हुई। उसके बाद से जैसे खुद पर ज़ोर ही नही चला ।कब उसके ख्याल में अपने आप को फ़ना कर देती थी नहीं पता ।प्यार, प्यार जैसा कुछ नहीं था हमारे बीच, पर उसकी तस्वीर जैसे एक ही नज़र में दिल के कैनवास में रंग गयी थी ।  ये मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीं पलों में से एक थे ।मैं लम्हा लम्हा उसके रंगों में रंगती जा रही थी….फिर वो  हुआ जो कभी नहीं सोचा ।
उसके और मेरे मुल्क के बींच एक सरहद का फर्क था, और शायद ये सरहद ही हमारे दिलों के बीच से हो कर गुज़र गयी ।उसे जाते हुए देखना सहज कभी न हो सका…
काश!!  इसदुनिया में सरहदें ही नहीं होती, तो कितना अच्छा होता…
काश!! मैं पंछी होती तो कितना अच्छा होता..
काश !! मुल्कों में ये दूरिया न होती, तो कितना अच्छा होता…
रात के तीन बज रहे थे, और मैं सोने की कोशिश कर रही थी, पड़ोस में एक ऑटो आकार रुक, शायद कोई मेहमान आया था । और उस ऑटो में गाना बज रहा था…
“पंछी नादिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके,सोचो तुमने और मैंने,क्या पाया  इंसान हो के…..”

Advertisements

Jasbaat | जज़्बात

मैं उसे भूलने की हर संभव कोशिश करती हूँ , पर वो है की हर लम्हे में नज़र आ जाता है।एक घुटन सी होती है ,कैंपस की फ़िज़ा में वो रौनक नहीं आती।लोग अक्सर पूछते है की क्या हो गया है, पर क्या होगया है ये समझ नहीं आता….

उसकी और मेरी ब्रांच में ज्यादा अंतर नहीं था, पर दिल की दूरियां और वास्तविक दुरी एक सी नहीं होती।मैं आज तक कारण समझ न पाई, तुम्हारे न करने की वजह, वो शाम आज भी किसी खंजर की तरह चुभती है, जब तुम मुझे अपना कह कर चले गए थे,हर मर्ज़ की दवा बनायीं है खुदा ने,इश्क़ का भी कोई मरहम होता तो आज शायद ये हश्र नहीं होती…..

मै आज भी रंज करती हूँ की तुम्हे चाहना मेरी कमज़ोरी थी या वक़्त की कोई अनकही साज़िश,इतनी समझदार तो नही हूँ, पर इतना तो जानती हूँ की इश्क़ किसी की ज़रूरत नहीं होती ,वो तो एक इबादत सा होता है, मासूम सा, पवित्र ओंस  के जैसा….

तुम लोगो का साथ छोड़ते हुए बुरा तो बहुत लगरहा था,पर कुछ फैसले ज़िन्दगी की जरुरत बनजाते है, कर भी क्या सकती थी….बड़ी आसानी से तुमने कह दिया….हम कभी एक नहीं हो सकते….we are good friends…

और उम्मीदों के सारे दरवाज़े  जैसे बंद हो गए, खुद को तो सम्भल लेती हूँ, पर कमबख्त इस दिल का क्या करती….

जब कभी तुम्हारी झलक दिख जाती है, तो आँखों के कोरो का काजल फैला जाता है…किस्मत ….बड़ी बेदर्द है ज़ालिम,जरूर किसी की माशुका रही होगी,जो आज इतना सताती है…इतना रुलाती है…

खैर सही कहा है…

लोग तो चले जाते है …..

बस यादें ही रह जाती है……..😢😶😶😢😢😢

Ishq Kagaz ka…

यूँ तो खाली पन्ने की तासीर ,
कुछ जुदा सी होती है
खाली सी,सफेद ,रंगो से परे ,अपने मे गुम,
मीलो के मोटे मोटे गट्टों मे बंद
किसी मुकाम के इंतेज़्ज़र मे,
ये खाली पन्ने,उकता जाते है
बाँधे जाते है एक धुरी मे
रंगबिरंगी सुतलियों के सहारे
फिर समय परवान चढ़ता है
और इन्ही पन्नो की ज़िंदगी मे
दस्तक देती है, एक कलाम
जिसकी मोहोब्बत के किससे
ज़माने मे मशहूर है
आहिस्ता आहिस्ता जब स्याही
अपनी छाप छोड़ती जाती है
पन्ने को मिलता है एक मुकाम
ज़िंदगी संवार जाती है,कलम के इश्क़ मे,
स्याही की भीनी भीनी खुश्बू सुनाती है
दास्तान मुहब्बत की
जिन्हे पन्नो का ज़ायका अल्फ़ाज़ देता है
यही तो कहानी है मेरी और तुम्हारी
तुम स्याही सी छाप छोड़ जाती हो,
और मैं एक पन्ने की तरह
तुम्हारी खुश्बू मे भीग जाता हूँ…….

Gulmohar ka Dard | गुल्मोहर का दर्द

कहने को तो दोनो के घर आमने -सामने थे, मगर वो चंद कदम का फासला किसी सागर से कम नहीं था।एक अदद कशिश थी उसकी आवाज़ में, जो हर किसी को जो हर किसी को अपना दीवाना बना देती थी।उसका हर एक लफ्ज़ जैसे कानो में मिश्री गोल देता था…..

वो जब भी अपनी सखियों संग चाँद की रौशनी में टहलने निकलती थी, वो लड़का अक्सर चाँद हो जाया करताथा।बीहड़ो का वो अल्हड लड़का, जब भी घर से निकलता ,आँखे हमेशा उसे ही तलाश रही होती थी।चाहे CKD हो या BBC उसे तो बस एक बहाना चाहिए होता था उसको एक नज़र निहार ने का, जैसवो उसकी धड़कने बन चुकी थी…..

वो अक्सर उससे बात करने की कई नाकाम कोशिश करता, उसको देखने के लिए labs और classes बंक करा करता था…

माल रोड की की उन हसीं सड़को पर जहां लड़को की नज़रे कुछ बर्फ सी हो जातीथी,वहा वो गुलमोहर के पेड़ के पीछे से उसे ताका करता था,उसे निहारा करता था….

कुछ दिनों से वो कुछ व्यस्त सी दिखाई पड़ती थी,
नयी उम्र भरपूर अंगड़ाई ले रही थी, और उस गाफलत मे ये भी कहा बचने वाली थी,छुट्टी का समय था,वो अपने एक दोस्त के साथ उसकी तलाश में था….

वो किसी और का हाथ थामे पार्क में घूम रही थी..बेचारे का दिल धक्क् रह गया,आज पहली बार उसे campus की फ़िज़ा में ऑक्सीजन की कमी महसूस हो रही थी…..वो पार्क में घूम रही थी…जाती हुई बस में गाना बज रहा था…

“इश्क़ अगर एक तरफ हो तो सजा देता है,
और अगर दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है”..

..वो अभी भी वहीं खड़ा था अपने दोस्त के साथ….

गुलमोहर के पेड़ के पीछे…

Blue Bus Chronicles |ब्लू बस क्रॉनिकल्स

बात ये नही है की मुझ सीट नही मिलती, पर एक हाथ से बस का डंडा पकड़ कर , एक हाथ से मोबाइल चलना इस अड्वेंचरस थिंग . अरे भीया 15 रुपे मे अब क्या बच्चे की जान लोगे क्या?? खैर ठीक भी ही, रास्ते चलते हुए विमल, राजश्री और रजनीगंधा की पिचकारियों से बचाव तो मिल रहा है ना…हन भीया आग्गे लो….

4 सालों के सफ़र मे ये आज तक समझ नही आया, की लड़कियों को बोनट पर ही क्यू बिठाया जाता है | पर भगवान जो भी करता है , अच्छे के लिए करता है इस वाक्य मे मुझे पूर्ण विश्वास है |साफ शब्दो मे लिख कर चिपकाया जाता है, की “सीट 1 से 10 महिलाओं के लिए आरक्षित है” पर भीया पोहे की कसम, आज तक इन सीटन पर मैने लड़की को बेते नही देखा | अरे भीया, अगर लड़कियाँ बैठ जाएगी, जो ख़िड़ी मे से विमल की पिचकारी आपके काका कैस मारेंगे …???

आँखें ….बस यही तो दिखता है, बोनट पर, और ड्राइवर के कॅबिन मे |और सनसिल्क और वाटिका शम्पू की भीनी भीनी महक, फॉग सेंट के साथ , अजी वो तो कॉम्पलिमेंट्री है| आखें नही होती, ये सिग्नल ट्रॅनस्मिटरर होते है| भंवरकुआ से लेकर राजीव गाँधी प्रतिमा तक सबकी आँकें कहीं ना कहीं से सिग्नल पकड़ ही लेती है, बाकी निराश ना हो, अभी राजेंद्र नगर आना बाकी है| तो जनाब ,गड़बड़ी मे जो बड़ी सी गड़बड़ी है ना, बस वही सारी गड़बड़ी हो जाती है | जहा स्टियरिंग घुमा तो आप मैडम के उपर, फिर जैसे ही स्टियरिंग घुमा मेडम आपके उपर…खुदा सबकी सुनता है…..

“ये लोग इतने स्टूडेंट्स को चढ़ाते ही क्यू है,खड़े रहने की जगह तो होती नही है” मेडम भंवर कुआ से चढ़ी थी, पिंक येओ सूट, खुले बाल और यार्डली लंडन की महक, बात करना तो बनता है साहब.

“आप लोगो को भी सीट मिल जाती है, हमको तो ऐसे ही ट्रॅवेल करना होता है”

“हां, बहुत टफ होता है ना ”

“हां यार” और बातें निकल पड़ी सैर को…..

इतना ही काफ़ी होता है किसी लड़के को दिन मे सपने दिखाने के लिए, और लड़के की छोड़िए वो तो अपने बच्चे का नाम भी सोच चुका है, होता है| पर इन्हे कों बतायें, की आज इन लड़कियों के सो कॉल्ड बाय्फरेंड्स अर्थात कृत्रिम पतिदेव का बॅलेन्स ख़तम हो गया है, अन्यथा आपको इनकी आवाज़ भी सुनाई नही देती….

खैर प्रेम कथाएं तो लिखी ही इसी लिएजाती है की अधूरी छोड़ी जा सके, दर्द तो तब उठने लगता है जब अल्फ़ा आजाता है….

दोनो मेडीकप्स पर उतर जाते है,

लड़की बिना मुड़े कॉलेज को चल देती है….

लड़का खड़ा देखता रह जाता है………

Cherry wale lips |चेरी वाली लिप्स

 
 
पता नही यार ये मिड sem  की प्रकिया होती ही क्यू है | इसका मूल उद्देश्य बेचारे सो कॉल्ड इंजिनीयर्स को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने से ज़्यादा और कुछ नही होता है |
 
फॉर्मल शूस को ज़मीन पर बजाने का कोई लॉजिकल अर्थ नहीं था | लेकिन, ऐसा नही करना भी मुनासिब नही था |क्या करे, आता तो कुछ था नही, और इस बार तो साला कॉलेज वाले भी हमको एलिजिबल कर दिए, जाओ बेटा, कर लो अपनी इच्छा पूर्ति ,दे दो मिड सेम | इनविजिलेटर मेडम को दस सेकेंड मे दस डिफरेंट एंग्ल से ताड़ चुके थे, इनमे वो वाली बात नही है,जो खिड़की के पास बैठी लड़की पर थी | पिंक कलर की फ्रेम पर छोटे छोटे डॉगी बने हुए थे, और एक बाल की सुनहरी लट थी, जो की धूप मे सोनी सी दिख रही थी | चेरी कलर की गाढ़ी सी लिपस्टिक, जो की लगभग पेन के कोने को लाल कर चुकी थी |उसको देखने के बाद अगर पेपर को देखता, तो क्यूपिड की धारा 143 के तहत आजीवन सिंगल रहने की सज़ा हो जाती |
 
३ बार धमकी मिल चुकी थी , पर हम भी पक्के कोर वाले , इतने जल्दी समझ जाते तो ब्रांच बुरा मान जाती | और फिर ५ महीने बाद पास आउट होकर इंजिनियरिंग की डिग्री को क्या मुँह दिखाते |सो अब पूरी शिद्दत के साथ , उस मखमली सपने को देख रहे थे |हम कब झरने मे बहते चले गये, नही पता| पर टेबल पर से कॉपी गायब हो चुकी थी|सामने वही मेडम खड़ी थी , जिनको ताड़ना हम भूल चुके थे, शायद बुरा मान गयी|
 
“चलो, बहुत लिखना हो गया, जाओ”
हम अभी तक चेरी वाली लिप्स को ही देख रहे थे|
 
बस जाते जाते समय से एक ग़लती हो गयी|
 
टॉप तो हमने ही किया है …….
 
वो हमको देख कर मुस्कुरा दी………