Jasbaat | जज़्बात

मैं उसे भूलने की हर संभव कोशिश करती हूँ , पर वो है की हर लम्हे में नज़र आ जाता है।एक घुटन सी होती है ,कैंपस की फ़िज़ा में वो रौनक नहीं आती।लोग अक्सर पूछते है की क्या हो गया है, पर क्या होगया है ये समझ नहीं आता….

उसकी और मेरी ब्रांच में ज्यादा अंतर नहीं था, पर दिल की दूरियां और वास्तविक दुरी एक सी नहीं होती।मैं आज तक कारण समझ न पाई, तुम्हारे न करने की वजह, वो शाम आज भी किसी खंजर की तरह चुभती है, जब तुम मुझे अपना कह कर चले गए थे,हर मर्ज़ की दवा बनायीं है खुदा ने,इश्क़ का भी कोई मरहम होता तो आज शायद ये हश्र नहीं होती…..

मै आज भी रंज करती हूँ की तुम्हे चाहना मेरी कमज़ोरी थी या वक़्त की कोई अनकही साज़िश,इतनी समझदार तो नही हूँ, पर इतना तो जानती हूँ की इश्क़ किसी की ज़रूरत नहीं होती ,वो तो एक इबादत सा होता है, मासूम सा, पवित्र ओंस  के जैसा….

तुम लोगो का साथ छोड़ते हुए बुरा तो बहुत लगरहा था,पर कुछ फैसले ज़िन्दगी की जरुरत बनजाते है, कर भी क्या सकती थी….बड़ी आसानी से तुमने कह दिया….हम कभी एक नहीं हो सकते….we are good friends…

और उम्मीदों के सारे दरवाज़े  जैसे बंद हो गए, खुद को तो सम्भल लेती हूँ, पर कमबख्त इस दिल का क्या करती….

जब कभी तुम्हारी झलक दिख जाती है, तो आँखों के कोरो का काजल फैला जाता है…किस्मत ….बड़ी बेदर्द है ज़ालिम,जरूर किसी की माशुका रही होगी,जो आज इतना सताती है…इतना रुलाती है…

खैर सही कहा है…

लोग तो चले जाते है …..

बस यादें ही रह जाती है……..😢😶😶😢😢😢