सरहदों का राज़ |Secret Of Boundries

रात 11 बजे शहर की गलियों में हो रही मस्ती साफ़ साफ़ बोल रही थी ।सेमीफाइनल में बांग्लादेश को हरा कर, भारत फाइनल में पहुँच  गया । और अब फाइनल में मुकाबला ,पकिस्तान से…खैर…

काफी दिन हो गए थे , डायरी में कुछ लिखा ही नहीं । कैसे लिखती ये content राइटिंग के काम में वक़्त ही नहीं मिलता। और आज जाने क्यों मैच जीतने की ख़ुशी ,किसी के हार जाने के गम से ज्यादा महसूस नहीं कर पा रही थी मैं, जैसे इस जीत में भी कुछ हार सी गयी थी मैं…

एक ऊँगली टेबल लैंप के स्विच को आँख मिचौनी के खेल में उलझा रही थी, और वही दूसरे हाथ में पेन न जाने कितने बार बंद हो कर चालू हो चूका था । इतने किस्से , कहानी लिखने वाली लड़की को आज कुछ याद नहीं आ रहा था ।  वो उस पन्ने के कोने पर लिखती है, “भारत-बांग्लादेश” मैच,और उसकी दुनिया किसी और दुनिया की सैर को हो लेती है…

कॉलेज की दीवारें किसी के स्वागत के  लिए फिर से पुतवाई गयी थी, और  हो भी क्यों न,जब बात South Asian youth festival की हो, तब युवा होने का मन सा करता है। मैं कॉलेज unit से, Festival Reporter थी तब मैं उससे मिली…वो एक अलग ही एहसास था ।मैं जिसे शायद कभी लफ़्ज़ों में नहीं लिख पाऊँगी। उसे पहली बार देखने का वो अनोखा सुख अपने आप में अकल्पनिय था ।दिल में इच्छा थी की उससे मिल सकूँ और वो पुरी भी हुई। उसके बाद से जैसे खुद पर ज़ोर ही नही चला ।कब उसके ख्याल में अपने आप को फ़ना कर देती थी नहीं पता ।प्यार, प्यार जैसा कुछ नहीं था हमारे बीच, पर उसकी तस्वीर जैसे एक ही नज़र में दिल के कैनवास में रंग गयी थी ।  ये मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीं पलों में से एक थे ।मैं लम्हा लम्हा उसके रंगों में रंगती जा रही थी….फिर वो  हुआ जो कभी नहीं सोचा ।
उसके और मेरे मुल्क के बींच एक सरहद का फर्क था, और शायद ये सरहद ही हमारे दिलों के बीच से हो कर गुज़र गयी ।उसे जाते हुए देखना सहज कभी न हो सका…
काश!!  इसदुनिया में सरहदें ही नहीं होती, तो कितना अच्छा होता…
काश!! मैं पंछी होती तो कितना अच्छा होता..
काश !! मुल्कों में ये दूरिया न होती, तो कितना अच्छा होता…
रात के तीन बज रहे थे, और मैं सोने की कोशिश कर रही थी, पड़ोस में एक ऑटो आकार रुक, शायद कोई मेहमान आया था । और उस ऑटो में गाना बज रहा था…
“पंछी नादिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके,सोचो तुमने और मैंने,क्या पाया  इंसान हो के…..”

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Jasbaat | जज़्बात

मैं उसे भूलने की हर संभव कोशिश करती हूँ , पर वो है की हर लम्हे में नज़र आ जाता है।एक घुटन सी होती है ,कैंपस की फ़िज़ा में वो रौनक नहीं आती।लोग अक्सर पूछते है की क्या हो गया है, पर क्या होगया है ये समझ नहीं आता….

उसकी और मेरी ब्रांच में ज्यादा अंतर नहीं था, पर दिल की दूरियां और वास्तविक दुरी एक सी नहीं होती।मैं आज तक कारण समझ न पाई, तुम्हारे न करने की वजह, वो शाम आज भी किसी खंजर की तरह चुभती है, जब तुम मुझे अपना कह कर चले गए थे,हर मर्ज़ की दवा बनायीं है खुदा ने,इश्क़ का भी कोई मरहम होता तो आज शायद ये हश्र नहीं होती…..

मै आज भी रंज करती हूँ की तुम्हे चाहना मेरी कमज़ोरी थी या वक़्त की कोई अनकही साज़िश,इतनी समझदार तो नही हूँ, पर इतना तो जानती हूँ की इश्क़ किसी की ज़रूरत नहीं होती ,वो तो एक इबादत सा होता है, मासूम सा, पवित्र ओंस  के जैसा….

तुम लोगो का साथ छोड़ते हुए बुरा तो बहुत लगरहा था,पर कुछ फैसले ज़िन्दगी की जरुरत बनजाते है, कर भी क्या सकती थी….बड़ी आसानी से तुमने कह दिया….हम कभी एक नहीं हो सकते….we are good friends…

और उम्मीदों के सारे दरवाज़े  जैसे बंद हो गए, खुद को तो सम्भल लेती हूँ, पर कमबख्त इस दिल का क्या करती….

जब कभी तुम्हारी झलक दिख जाती है, तो आँखों के कोरो का काजल फैला जाता है…किस्मत ….बड़ी बेदर्द है ज़ालिम,जरूर किसी की माशुका रही होगी,जो आज इतना सताती है…इतना रुलाती है…

खैर सही कहा है…

लोग तो चले जाते है …..

बस यादें ही रह जाती है……..😢😶😶😢😢😢

Zulfeeniyat|ज़ुल्फिनियत

मधुर यामिनी मचल रही है

अम्बर तक उड़ जाने को

चंद्र कला की चंचलता है

सम्मोहित अंधियारे को

मन मेरा जिन पर मोहित है

चाह नहीं मैं छू पाऊँ

मचल रही है दाख लता

उसकी हाला बन जाने को,

कोई कस्तूरी घोल चुकी है

वो कारे अंधियारे में

महक रहा है ऐसे तन मन

चन्दन वन बन जाने को

पूर्ण चंद्र की एक रात में

गर वो पुलिंदा खुल जाए

हो जाये ‘शुभम‘ सम्मोहित

केश पुष्प बन जाने को

Ishq Kagaz ka…

यूँ तो खाली पन्ने की तासीर ,
कुछ जुदा सी होती है
खाली सी,सफेद ,रंगो से परे ,अपने मे गुम,
मीलो के मोटे मोटे गट्टों मे बंद
किसी मुकाम के इंतेज़्ज़र मे,
ये खाली पन्ने,उकता जाते है
बाँधे जाते है एक धुरी मे
रंगबिरंगी सुतलियों के सहारे
फिर समय परवान चढ़ता है
और इन्ही पन्नो की ज़िंदगी मे
दस्तक देती है, एक कलाम
जिसकी मोहोब्बत के किससे
ज़माने मे मशहूर है
आहिस्ता आहिस्ता जब स्याही
अपनी छाप छोड़ती जाती है
पन्ने को मिलता है एक मुकाम
ज़िंदगी संवार जाती है,कलम के इश्क़ मे,
स्याही की भीनी भीनी खुश्बू सुनाती है
दास्तान मुहब्बत की
जिन्हे पन्नो का ज़ायका अल्फ़ाज़ देता है
यही तो कहानी है मेरी और तुम्हारी
तुम स्याही सी छाप छोड़ जाती हो,
और मैं एक पन्ने की तरह
तुम्हारी खुश्बू मे भीग जाता हूँ…….

UPSC story | यूपीएससी

ओफ़्फ़ो… तीन बज गए! कबका उठा हुआ हूँ, पता ही नहीं चला! अभी तक नहाया भी नहीं… कल से उठते के साथ नहाऊंगा। हैं नहीं तो। सुबह का उठा था, पेपर ही पढता रह गया… किया क्या सुबह से? नाश्ता किया, थोड़ी देर ‘राम की शक्ति पूजा’ पढ़ी और तीन बज गए।

ये गर्मियों की सुबह भी ना! सुबह कहाँ, दोपहर लगती है। उठेगा तो आदमी वही नौ बजे ही न! सर्दियाँ होती तो लगता भोर में ही उठ गए। वैसे ना भी नहाऊँ तो क्या हो जाएगा? नसीरुद्दीन से रणबीर तो लगने से रहा… हा हा हा।

एक काम साला और करना पड़ेगा इस भैंन के टके तुलसी को कल टाइट करता हूँ, रोज़ लेट पर लेट होता जा रहा है। तीन साल हो गए। इतने गिफ्ट तो मेरे बाप ने आज तक मुझको नहीं दिए होंगे, जितना ये तुलसिया खींच ले गया है। फिर भी साला। मुँह कुछ ज्यादा लग गया है। करें भी क्या? जरा कुछ कहो तो जैसे पिया परदेश गए हों और सास ने बहु को ताना मार दिया हो, गेट पकड़ के खड़ा हो जाएगा। तीन दिन बोलेगा नहीं। और तो और हम कुछ कह भी तो नहीं पाते। ख़ैर…

मन ही मन सोचता, बड़बड़ाता, हँसता और कोसता-सा अशोक उठा और अंततः नहाने चला गया।

नहा के आया और वही शर्ट पहनी जो उसे बर्थडे पर मिली थी। गेंहुए रंग पर काली शर्ट जमती है। कुछ भी कहो लड़कियाँ न बताये तो लौंडे यही मान के बैठे रहें कि काले हैं और काला पहिन लिए! ऐसा लगेगा जैसे सड़क पर इस्टीम इंजन चला आ रहा हो। हा हा हा…

खटा खट कपड़े पहने, डियो उड़ेला, और फिर वही मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक… चल दिया चाय-सुट्टा पीने। लेकिन आज दिन ख़ास था सो दौड़ भी लम्बी थी। अभी सीढ़ियों पर ही था कि नीचे से मोशी बोली, “कहाँ बेट्टा? बस फूंक डाले होगे रात भर में सारी…” तब तक अशोक भी नीचे पहुंचा, मोशी ने उसे ब्लैक शर्ट में देखा और मन ही मन सोचती सी ऐसे देखने लगी जैसे पहले दिन स्कूल ड्रेस में माँ देखती है बच्चे को, बोली, “एकदम राजा बाबू लग रहे हो।”

“हा हा हा! तुमको तो बस राजा बाबू ही दिखता है हर जगह। और तुम आज ही वापस चली आईं? हम तो सोचे अभी कल ही अफसर बनी हो, दो चार दिन अपनी अफसरी झाड़ती घूमोगी रिश्तेदारी में…”

“फ़ालतू न बोलो तुम, समझे गदहू लाल? वैसे कहाँ जा रहे थे? इत्ता चमक के?”

“अरे कहीं नहीं। सोचा अपने मक्खन सिंह की चाय पीयूँगा और खुशखबरी सुनाऊंगा। बस अभी तो निकला हूँ नहा के।”

“अरे हाँ हाँ, वो तो दिख रहा है…”

“बड़ी खुश लग रही हो आज। अच्छी लग रही हो।”

“हाँ! अच्छी क्यों नहीं लगूंगी? ये टॉप याद है? तुमने ही तो दिया था। आज तक शायद ही कोई मिला हो जिसने इस कुर्ते की तारीफ़ न की हो। चलो आज मुझको कुछ अच्छा सा गिफ्ट दिलाओ?”

“गिफ्ट? अच्छा बताओ क्या लोगी?”

“जो तुम दो… बस मैं साथ नहीं जाउंगी अकेले जाना। …अच्छा तो फिरररररर खूब सारी मैटल की चूड़ियाँ और एक साडी।”

“ठीक है।”

“ठीक! बड़ी जल्दी मान गए… मैं नहीं जाउंगी चाहे जो कर लेना! फिर मत कहना शर्म आती है! …खैर! अच्छा यार तुम छोडो जो भी देना हो दे देना। …अरे सुनो ना आशु मैं भी चलूंगी मक्खन भैय्या के यहाँ। याद है कितना बढ़िया टाइम था वो राजेंदर नगर वाला?”

“हाँ था तो, और अब आगे भी अच्छा टाइम आ गया बस। ऐसा करो दो मिनेट रुको, मैं एक मिनट में ऊपर से आता हूँ।” बोलते बोलते अशोक ऊपर भाग गया।

मोशी वहीं खड़ी रही और मक्खन सिंह की वो आर्य समाज मंदिर के पास वाली, मिट्टी से लिपी, कच्चे छप्पर की दुकान और मक्खन भैय्या की वो अवधी बातें, अपने और अशोक के वो शुरू के मिलने जुलने के दिन। जब नया नया अशोक उससे भिड़ गया था, टेस्ट सीरीज़ में। कैसा सा तो था, हमेशा विधवा औरतों की तरह सफ़ेद कपडे पहनता था। हा हा हा।

ज़रा सी देर में सब कुछ घूम गया… मक्खन सिंह की दुकान से होते हुए कल का दिन आ गया। हाँ, बस कल का दिन। वही कल जो बस कल बीता है। कितने बरसों बाद ये दिन आया है। कितना रुलाने के बाद। कितनी तबीयत ख़राब होने के बाद। मशक्कत के बाद। इन सब में मेरे साथ अशोक न होता तो? मोशी सोच ही रही थी की अशोक के तेजी से सीढ़ियां उतरने की आवाज आई।

“यार! तुमसे कितनी बार बोला है आराम से उतरा करो! नीचे आंटी क्या सोचती होंगी?”

“अरे मैं सोचा तुम वेट कर रही हो। तो जल्दी जल्दी आया और तुम। हैं नहीं तो।”

“अच्छा करने क्या गए थे ऊपर?”

“वॉलेट भूल गया था, वही लेने गया था। अरे वो सब छोड़ो ये बताओ मक्खन भैया को कुछ दोगी? याद है हमने कहा था चाहे भैय्या जिसका भी हो पहले, दोनों ही आएंगे मिठाई लेकर…”

“हाँ याद है, लेकिन फिर तुम अकेले क्यों जा रहे थे?”

“बोला तो हमने सोचा मैडम अफसर बन गयी है, कहाँ याद रखेंगी हमको और फिर मक्खन सिंह जैसों को ही उजाड़ने की सरकार तुमको अब तनखाह देगी! हा हा हा हा…”

“अच्छा ऐसी हूँ मैं? तुमको तो भले याद न रखूँ पर मक्खन को कैसे…? वहीं तो मुझे तुम मिले थे, मेरे गदहा प्रसाद। ही ही ही ही।”

“अरे बताओ कुछ ले लू यहीं मुखर्जी नगर से?”

“क्या लोगे”

“अरे कुछ भी मीठा, मेरठवाले से…”

“आशु मैंने तो ना कुछ और सोचा था… सरवना भवन चलेंगे, उनको लेकर सी पी वाले। क्यों?”

“हाँ ठीक है, पर वो दुकान छोड़ के जाएंगे?”

“पता नहीं पर ट्राई करने में क्या जाता है?”

“हम्म्म्म्म!! अब पार्टनर बोल दिया है तो देख लेंगे।”

“हाँ देख लेंगे। ही ही ही ही…”

दोनों चुपचाप मेट्रो की तरफ जाने लगे। खुश हैं दोनों आज। अशोक को दो साल हुए लखनऊ से आय और मोशी को करीब ढाई-पौने तीन साल। दोनों लखनऊ के ही हैं। एक सरोजनी नगर की तो दूसरा गोमती नगर का। दोनों के परिवार संपन्न। एक जात, सब मस्त। भला-चंगा। अशोक इंजीनियर है और मोशी लखनऊ यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य में मास्टर्स। दोनों शांत से मेट्रो में बैठे चले जा रहें हैं। मोशी अशोक के बारे में सोच रही है और अशोक मोशी के बारे में।

लग ही नहीं रहा जैसे कल ही यूपीएससी का फ़ाइनल रिज़ल्ट आया। मोशी को आई ए एस मिल जाएगा। किस्मत अच्छी हुई तो यूपी कैडर भी। मिल ही जाएगा किस्मतिया तो अच्छी है ही इसकी। सोचता सोचता अशोक उसके जाने की तैयारी, फलाना-ढिकाना से होता हुआ, उसके ट्रेनिंग पर जाने तक आ गया। अभी मई है… जून, जुलाई, अगस्त… तीन महीना है। फिर ये चली जायेगी और मैं अकेला हो जाऊंगा। उधर मोशी भी सब कुछ सोचते सोचते सितम्बर की जॉइनिंग तक आ गयी। एक तीखी उदासी दोनों के चेहरे पे छा गयी। एक दूसरे की ओर देखा और समझ गए की क्या चल रहा है। मोशी की तो आखें डबडबा सी गयी।

फिर सोच में डूबे दोनों पता नहीं कहाँ खो गए। मोशी सोच रही है कि अशोक का भी होता तो कितना अच्छा होता। साथ साथ लॉब्सना जाते… मसूरी… वाह! हलकी-सी मुस्कान दौड़ गयी। लेकिन फिर वही कि अकेले जाना है। और उधर अशोक के दिमाग में कुछ और ही चल रहा है। वो मसूरी नहीं लखनऊ पहुंचा हुआ है। पता नहीं मेरा हुआ नहीं, इसकी वजह से इसके माँ-बाप शादी के लिए मना न कर दें। अब कितना भी जल्दी हुआ मेरा, तब भी डेढ़ साल तो मान ही लो। डेढ़ साल रुकेंगे इसके घर वाले? बाप तो वैसे भी इसका हरामखोर कम नहीं। वो तो माँ है, जो मुझे पसंद करती है। बहुत गहरा उतर गया था अशोक, एक दम शून्य। ब्लैंक…।

इतने में मोशी उसका हाथ हिलाती है। उठो राजीव चौक आ गया। दोनों मेट्रो से बाहर निकलते हैं। अशोक आगे आगे ब्लू लाइन की तरफ बढ़ा। पीछे से लगभग भाग कर मोशी उसको पकड़ती है, “यार तुम इतना दूर दूर क्यों भाग के चलते हो? ऐसे तो मेरे मम्मी पापा, इस उम्र में, रात को वाक पर निकलते हैं।”

“अच्छा अच्छा, पापा पुराण छोडो और चलो, भीड़ थी इसलिए आगे निकल गया। अगल बगल तो चल नहीं सकता।”

“हाँ पता है कितनी बड़ी भीड़ है। अच्छा सुनो, मुझे सीपी जाना है।”

“क्यों अब क्या हुआ? यार पहले मक्खन के पास चलो…”

“अरे बाबा हम उनके लिए ही एक शर्ट लेने जा रहे हैं।”

“सीपी पे? मक्खन की शर्ट? पगला वगला गयी हो क्या” उतने पैसे दे देना उसके कुछ काम आएंगे। वो क्या करेगा इतनी महंगी शर्ट पहिन कर?”

“करेगा क्या! वही जो तुम करते हो… चमक के घूमेगा, अपनी मईडम के साथ। खी खी खी खी।”

“बकवास करवा लो तुमसे बस!”

“अच्छा चलो।”

दोनों चलने लगे मेट्रो गेट के बाहर की ओर। बाहर निकलते ही मोशी ने कुछ देर सोचते हुए से पूछा, “यार तुम मेरे पापा से इतना चिढ़ते क्यों हो?”

“कौन चिढ़ता है? मैं?”

“नहीं, मक्खन सिंह! तुमसे बात कर रही हूँ न? इतने सालों में इतना तो समझ ही गयी हूँ की तुम कैसे मुझे चिढ़ाते हो और कैसे मुझे खिजाते हो या कैसे खुद खीजते हो, गुस्सा होते हो। अब बात न बदलो, कायदे से बोलो।”

“चिढ़ता नहीं हूँ। चिढ़ुंगा क्यों? उन्होंने कौन-सी मेरी बेटी भगा ली है? हा हा हा हा! बेटी तो उनकी मैं भगाऊंगा। चिढ़ता नहीं हूँ बेटा, बस थोड़ा सा उनका एटीट्यूड मुझे नहीं पसंद। हमेशा ऐंठे ऐंठे से रहते हैं। जैसे पता नहीं किस बात का नाज़ है। अब देखो! घमंड नहीं बोला है। चढ़ मत जाना। तुम्हारे साथ रहकर इतना साहित्य तो मैं भी सीख गया हूँ कि उर्दू का नाज़ और हिंदी के घमंड में किसका भाव क्या है? क्यों?”

“हाँ ठीक है। वैसे ऐसा हैं नहीं आशु। पापा शुरू से नहीं थे। मुझे बचपन याद है अपना, जब मैं छोटी ही थी, इन फैक्ट, बारहवीं तक भी वो बड़े जॉली किसम के थे। उन्होंने मुझ पर या मीशू पर शायद ही कभी हाथ उठाया हो। वो तो तुम्हारे बारे में, जब से पता चला है, तब से थोड़ा मुझसे भी रूड हो गए हैं। अब शायद घर जाऊँ तो ठीक हों। उनको लगता था कि उन्होंने मुझे पढ़ने भेजा था। तुम्हारे साथ घूमने नहीं। पर शायद वो ये न समझ पायें कि अगर तुम ना होते तो मुझे इस दिल्ली में यूपीएससी से लड़ने में नानी याद आ जाती। अब तो बस, इस बार तुम्हारा हो जाय सेलेक्शन, बस। बस तुम थोड़ा अपनी स्टडी जनरलाईज़्ड कर दो। तुममे और मुझमे यही फरक है की तुम बहुत स्पेसिफिक हो जाते हो। स्टूडेंट और प्रोफ़ेसर की कॉपी में कुछ तो फर्क होना चाहिए न?”

अशोक बड़े गंभीर होकर सुन रहा था, बोला, “यार तुम तो अभी से अफसर टाइप साउंड करने लगी। मेरी पढ़ाई की छोडो…” “नहीं छोडो क्यों?” मोशी बीच में तपाक से बोली।

“यार मोशी मैं इस पर बहस नहीं चाहता। मूड अच्छा है और रूम तक पहुँचने तक अच्छा रहने दो। अपना भी और मेरा भी। और रही बात तुम्हारे पप्पा जी की तो किसी को पसंद न करने का ये मतलब कतई नहीं की आप उससे नफरत करते हैं। जिस दिन वो मुझसे सीधे मुँह बात करने लगेंगे, उस दिन मेरी भी समझ उनके लिए शायद बदले… और शायद ना भी बदले। लेकिन मुझे किसी पागल कुत्ते ने नहीं काटा है की ऐसे किसी को पसंद या नापसंद करता घूमू। हुह्ह्ह!! कर लिया न मूड खराब ?? यार तुमसे कितनी बार कहा है, अपने पप्पा की बात तब किया करो, जब उनकी कोई बात चले। बिना बात क्यों?”

“मैंने नहीं तुमने बात शुरू की उनकी। मोशी गुस्से में बोली। तुमने नहीं कहा पापा पुराण बंद करो। अब मैं अपने पापा को याद भी करूँ तुम्हारे सामने तो वो पुराण हो जाएगा?”

“मैंने कब कहा? और अगर कहा भी तो मज़ाक में कहा। अच्छा छोड़ो, शर्ट लो और चलो। देखो कितनी दूर आ गए। अब यहाँ से ऑटो से चलेंगे। मेट्रो से मक्खन तक बहुत धूप लगेगी। क्यों?” अशोक ने बात संभालते हुए कहा।

लेकिन मोशी का मुँह बन गया था। अशोक से पहले ही थे उसके पापा, आज भी। दोनों दुकान गए और एक बढ़िया सी नीले और सफ़ेद चेक की शर्ट ख़रीदी, पैक करायी। मोशी तो उसकी बीवी, जो गाँव में रहती थी, के लिए भी कुछ लेने वाली थी पर अशोक ने झिड़क दिया। अबकी बार बात मोशी ने सँभाली और बिना कुछ बोले उसके लिए कुछ पैसे रख देने की तय हुई। सुलह हुई। और दोनों मदर डेरी से मैंगो आइसक्रीम लेकर ऑटो में बैठ गए। और चल दिए अपने मक्खन भैय्या के पास।

मक्खन ने उनसे बिना पूछे ही कांच के गिलास में चाय बढ़ा दिए थे।

“अरे नहीं मक्खन, मोशी अब अफसर बन गयी है। अब तुम्हारी चाय काहे पियेगी ये। आज सीसीडी में कॉफी पिलाएगी कॉफी। तुम आज रहने दो।”

मक्खन को 12 रुपये की बिक्री की चिंता नहीं थी। हुलसकर कहा, “अच्छा माने इहौ अफसर बिटिया! वाह भइया, हमरा चाय पीके बिटिया अफसर बन गई है, इससे खुश की बात औ क्या हो सकत है… अच्छा तो है, एक-एक करके सब हमरी चाय पीके धीरे-धीरे सीसीडी में घुस जाते हैं। औ तुमरा क्या हुआ भइया, तुम कब घुसोगो सीसीडी में?”

मोशी के यूपीएससी में होने की खुशी के बीच मक्खन का ये सवाल इतनी तेजी से घुलकर उदासी में तब्दील हो जाएगा, अशोक इसके लिए तैयार न था। मोशी माहौल को हल्का करना चाहती थी, “अरे मक्खन भइया, पहले तो ये लो देखो हम लोग आपके लिए क्या लाए हैं और आपकी उनका नाप वाप पता नहीं था, पैसे रखें हैं इसमे उनके लिए बढ़िया साड़ी खरीदवा दीजियेगा और आज आप भी चलो न हमारे साथ सीसीडी। पहले एक काफ़ी पीते हैं फिर तीनो के तीनो चलेंगे बढ़िया डोसा खा के आएंगे।”

अब तक तो आस पास के दूकान वाले भी इंटरेस्ट लेने लगे। ख़ैर उधर ख़ुशी से मक्खन छाती फूल गयी। बोला, “हम? अरे… धत्त … बिटिया… हम आप दोनों के बीच जाकर क्या करेंगे, उहां आप जाइए, आराम से सोफा में धसिए औ अशोक भइया से पूछ-पूछके शक्कर डालिए, औ काफी बनाइए!”

“अबे तो तुम आज तक यहां क्या करते थे हमारे बीच?” अशोक बोला। “हियां? हियां चाय ढारते थे, औ अशोक भइया और बिटिया के आंखों के बीच की आवाजाही देखते थे… पवन चक्की जैसी फुक्क-फुक्क आती-जाती नजरें, सैइकिल जैसी टकरातें नजरे देखते थे और भीतरे-भीतर आशीष देते थे कि दुनहुं का एके साथ कुछ हो जाए”

ओह मक्खन भइया, कमऑन… अब तुम भी कविया गए।” मोशी शर्माती हुई बोली। “काहे, आप ही तो भैय्या को हियें बैठा बैठा के महीना का महीना पिरेमचंद से रेनु, निराला, शमशेर का खिस्सा-चर्चा करके हमरा भेजा निचोड़ती थी। दुनहुं मिलके त उस समय नहीं समझ आता था कि मक्खन भइया को कुछ बुझाता है भी कि नहीं?”

“हम तुमको बहुत मिस्स करेंगे मक्खन भइया! चलोगे हमारे साथ जहां पोस्टिंग होगी?” मोशी याचना से बोली।

“हमको छोडिए अशोक भइया को लेले जाइए… उ आपके बिना तैयारी करेंगे… हहरके मर जाएंगे इ राजिंदर नगर औ मुकरजी नगर के जंगला में!”

“क्यों अशोक? तुम क्यों चुप्प हो?”

“कुछ नहीं मोशू, सोच रहा था तुमने आज पहली बार खुद से मुझसे गिफ्ट मांगा है, क्या दूं?”

मोशी बोली, “अच्छा, तुम… तुम, मुझे मक्खन भइया की इस दूकान का एक टुकड़ा दे दोगे? सरकारी क्वार्टर की ड्राइंगरुम में बहुत खूबसूरत लगेगी… है न? …हमारे रोज मिलने की जमीन… तुमको नज़र भर भर देखने की ज़मीन… सपने बुनने की जमीन और सबसे बड़ी… तुमको पाने की ज़मीन…”

मक्खन भैय्या बस आशीष की मुद्रा में खड़े दोनों को वापस जाते देखते रहते हैं।

किसी ने लाईक किया इतना पुराना पोस्ट तो हमने रीपोस्टकर दिया। जय बाबा विश्वनाथ की !!

Gulmohar ka Dard | गुल्मोहर का दर्द

कहने को तो दोनो के घर आमने -सामने थे, मगर वो चंद कदम का फासला किसी सागर से कम नहीं था।एक अदद कशिश थी उसकी आवाज़ में, जो हर किसी को जो हर किसी को अपना दीवाना बना देती थी।उसका हर एक लफ्ज़ जैसे कानो में मिश्री गोल देता था…..

वो जब भी अपनी सखियों संग चाँद की रौशनी में टहलने निकलती थी, वो लड़का अक्सर चाँद हो जाया करताथा।बीहड़ो का वो अल्हड लड़का, जब भी घर से निकलता ,आँखे हमेशा उसे ही तलाश रही होती थी।चाहे CKD हो या BBC उसे तो बस एक बहाना चाहिए होता था उसको एक नज़र निहार ने का, जैसवो उसकी धड़कने बन चुकी थी…..

वो अक्सर उससे बात करने की कई नाकाम कोशिश करता, उसको देखने के लिए labs और classes बंक करा करता था…

माल रोड की की उन हसीं सड़को पर जहां लड़को की नज़रे कुछ बर्फ सी हो जातीथी,वहा वो गुलमोहर के पेड़ के पीछे से उसे ताका करता था,उसे निहारा करता था….

कुछ दिनों से वो कुछ व्यस्त सी दिखाई पड़ती थी,
नयी उम्र भरपूर अंगड़ाई ले रही थी, और उस गाफलत मे ये भी कहा बचने वाली थी,छुट्टी का समय था,वो अपने एक दोस्त के साथ उसकी तलाश में था….

वो किसी और का हाथ थामे पार्क में घूम रही थी..बेचारे का दिल धक्क् रह गया,आज पहली बार उसे campus की फ़िज़ा में ऑक्सीजन की कमी महसूस हो रही थी…..वो पार्क में घूम रही थी…जाती हुई बस में गाना बज रहा था…

“इश्क़ अगर एक तरफ हो तो सजा देता है,
और अगर दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है”..

..वो अभी भी वहीं खड़ा था अपने दोस्त के साथ….

गुलमोहर के पेड़ के पीछे…

Blue Bus Chronicles |ब्लू बस क्रॉनिकल्स

बात ये नही है की मुझ सीट नही मिलती, पर एक हाथ से बस का डंडा पकड़ कर , एक हाथ से मोबाइल चलना इस अड्वेंचरस थिंग . अरे भीया 15 रुपे मे अब क्या बच्चे की जान लोगे क्या?? खैर ठीक भी ही, रास्ते चलते हुए विमल, राजश्री और रजनीगंधा की पिचकारियों से बचाव तो मिल रहा है ना…हन भीया आग्गे लो….

4 सालों के सफ़र मे ये आज तक समझ नही आया, की लड़कियों को बोनट पर ही क्यू बिठाया जाता है | पर भगवान जो भी करता है , अच्छे के लिए करता है इस वाक्य मे मुझे पूर्ण विश्वास है |साफ शब्दो मे लिख कर चिपकाया जाता है, की “सीट 1 से 10 महिलाओं के लिए आरक्षित है” पर भीया पोहे की कसम, आज तक इन सीटन पर मैने लड़की को बेते नही देखा | अरे भीया, अगर लड़कियाँ बैठ जाएगी, जो ख़िड़ी मे से विमल की पिचकारी आपके काका कैस मारेंगे …???

आँखें ….बस यही तो दिखता है, बोनट पर, और ड्राइवर के कॅबिन मे |और सनसिल्क और वाटिका शम्पू की भीनी भीनी महक, फॉग सेंट के साथ , अजी वो तो कॉम्पलिमेंट्री है| आखें नही होती, ये सिग्नल ट्रॅनस्मिटरर होते है| भंवरकुआ से लेकर राजीव गाँधी प्रतिमा तक सबकी आँकें कहीं ना कहीं से सिग्नल पकड़ ही लेती है, बाकी निराश ना हो, अभी राजेंद्र नगर आना बाकी है| तो जनाब ,गड़बड़ी मे जो बड़ी सी गड़बड़ी है ना, बस वही सारी गड़बड़ी हो जाती है | जहा स्टियरिंग घुमा तो आप मैडम के उपर, फिर जैसे ही स्टियरिंग घुमा मेडम आपके उपर…खुदा सबकी सुनता है…..

“ये लोग इतने स्टूडेंट्स को चढ़ाते ही क्यू है,खड़े रहने की जगह तो होती नही है” मेडम भंवर कुआ से चढ़ी थी, पिंक येओ सूट, खुले बाल और यार्डली लंडन की महक, बात करना तो बनता है साहब.

“आप लोगो को भी सीट मिल जाती है, हमको तो ऐसे ही ट्रॅवेल करना होता है”

“हां, बहुत टफ होता है ना ”

“हां यार” और बातें निकल पड़ी सैर को…..

इतना ही काफ़ी होता है किसी लड़के को दिन मे सपने दिखाने के लिए, और लड़के की छोड़िए वो तो अपने बच्चे का नाम भी सोच चुका है, होता है| पर इन्हे कों बतायें, की आज इन लड़कियों के सो कॉल्ड बाय्फरेंड्स अर्थात कृत्रिम पतिदेव का बॅलेन्स ख़तम हो गया है, अन्यथा आपको इनकी आवाज़ भी सुनाई नही देती….

खैर प्रेम कथाएं तो लिखी ही इसी लिएजाती है की अधूरी छोड़ी जा सके, दर्द तो तब उठने लगता है जब अल्फ़ा आजाता है….

दोनो मेडीकप्स पर उतर जाते है,

लड़की बिना मुड़े कॉलेज को चल देती है….

लड़का खड़ा देखता रह जाता है………