UPSC story | यूपीएससी

ओफ़्फ़ो… तीन बज गए! कबका उठा हुआ हूँ, पता ही नहीं चला! अभी तक नहाया भी नहीं… कल से उठते के साथ नहाऊंगा। हैं नहीं तो। सुबह का उठा था, पेपर ही पढता रह गया… किया क्या सुबह से? नाश्ता किया, थोड़ी देर ‘राम की शक्ति पूजा’ पढ़ी और तीन बज गए।

ये गर्मियों की सुबह भी ना! सुबह कहाँ, दोपहर लगती है। उठेगा तो आदमी वही नौ बजे ही न! सर्दियाँ होती तो लगता भोर में ही उठ गए। वैसे ना भी नहाऊँ तो क्या हो जाएगा? नसीरुद्दीन से रणबीर तो लगने से रहा… हा हा हा।

एक काम साला और करना पड़ेगा इस भैंन के टके तुलसी को कल टाइट करता हूँ, रोज़ लेट पर लेट होता जा रहा है। तीन साल हो गए। इतने गिफ्ट तो मेरे बाप ने आज तक मुझको नहीं दिए होंगे, जितना ये तुलसिया खींच ले गया है। फिर भी साला। मुँह कुछ ज्यादा लग गया है। करें भी क्या? जरा कुछ कहो तो जैसे पिया परदेश गए हों और सास ने बहु को ताना मार दिया हो, गेट पकड़ के खड़ा हो जाएगा। तीन दिन बोलेगा नहीं। और तो और हम कुछ कह भी तो नहीं पाते। ख़ैर…

मन ही मन सोचता, बड़बड़ाता, हँसता और कोसता-सा अशोक उठा और अंततः नहाने चला गया।

नहा के आया और वही शर्ट पहनी जो उसे बर्थडे पर मिली थी। गेंहुए रंग पर काली शर्ट जमती है। कुछ भी कहो लड़कियाँ न बताये तो लौंडे यही मान के बैठे रहें कि काले हैं और काला पहिन लिए! ऐसा लगेगा जैसे सड़क पर इस्टीम इंजन चला आ रहा हो। हा हा हा…

खटा खट कपड़े पहने, डियो उड़ेला, और फिर वही मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक… चल दिया चाय-सुट्टा पीने। लेकिन आज दिन ख़ास था सो दौड़ भी लम्बी थी। अभी सीढ़ियों पर ही था कि नीचे से मोशी बोली, “कहाँ बेट्टा? बस फूंक डाले होगे रात भर में सारी…” तब तक अशोक भी नीचे पहुंचा, मोशी ने उसे ब्लैक शर्ट में देखा और मन ही मन सोचती सी ऐसे देखने लगी जैसे पहले दिन स्कूल ड्रेस में माँ देखती है बच्चे को, बोली, “एकदम राजा बाबू लग रहे हो।”

“हा हा हा! तुमको तो बस राजा बाबू ही दिखता है हर जगह। और तुम आज ही वापस चली आईं? हम तो सोचे अभी कल ही अफसर बनी हो, दो चार दिन अपनी अफसरी झाड़ती घूमोगी रिश्तेदारी में…”

“फ़ालतू न बोलो तुम, समझे गदहू लाल? वैसे कहाँ जा रहे थे? इत्ता चमक के?”

“अरे कहीं नहीं। सोचा अपने मक्खन सिंह की चाय पीयूँगा और खुशखबरी सुनाऊंगा। बस अभी तो निकला हूँ नहा के।”

“अरे हाँ हाँ, वो तो दिख रहा है…”

“बड़ी खुश लग रही हो आज। अच्छी लग रही हो।”

“हाँ! अच्छी क्यों नहीं लगूंगी? ये टॉप याद है? तुमने ही तो दिया था। आज तक शायद ही कोई मिला हो जिसने इस कुर्ते की तारीफ़ न की हो। चलो आज मुझको कुछ अच्छा सा गिफ्ट दिलाओ?”

“गिफ्ट? अच्छा बताओ क्या लोगी?”

“जो तुम दो… बस मैं साथ नहीं जाउंगी अकेले जाना। …अच्छा तो फिरररररर खूब सारी मैटल की चूड़ियाँ और एक साडी।”

“ठीक है।”

“ठीक! बड़ी जल्दी मान गए… मैं नहीं जाउंगी चाहे जो कर लेना! फिर मत कहना शर्म आती है! …खैर! अच्छा यार तुम छोडो जो भी देना हो दे देना। …अरे सुनो ना आशु मैं भी चलूंगी मक्खन भैय्या के यहाँ। याद है कितना बढ़िया टाइम था वो राजेंदर नगर वाला?”

“हाँ था तो, और अब आगे भी अच्छा टाइम आ गया बस। ऐसा करो दो मिनेट रुको, मैं एक मिनट में ऊपर से आता हूँ।” बोलते बोलते अशोक ऊपर भाग गया।

मोशी वहीं खड़ी रही और मक्खन सिंह की वो आर्य समाज मंदिर के पास वाली, मिट्टी से लिपी, कच्चे छप्पर की दुकान और मक्खन भैय्या की वो अवधी बातें, अपने और अशोक के वो शुरू के मिलने जुलने के दिन। जब नया नया अशोक उससे भिड़ गया था, टेस्ट सीरीज़ में। कैसा सा तो था, हमेशा विधवा औरतों की तरह सफ़ेद कपडे पहनता था। हा हा हा।

ज़रा सी देर में सब कुछ घूम गया… मक्खन सिंह की दुकान से होते हुए कल का दिन आ गया। हाँ, बस कल का दिन। वही कल जो बस कल बीता है। कितने बरसों बाद ये दिन आया है। कितना रुलाने के बाद। कितनी तबीयत ख़राब होने के बाद। मशक्कत के बाद। इन सब में मेरे साथ अशोक न होता तो? मोशी सोच ही रही थी की अशोक के तेजी से सीढ़ियां उतरने की आवाज आई।

“यार! तुमसे कितनी बार बोला है आराम से उतरा करो! नीचे आंटी क्या सोचती होंगी?”

“अरे मैं सोचा तुम वेट कर रही हो। तो जल्दी जल्दी आया और तुम। हैं नहीं तो।”

“अच्छा करने क्या गए थे ऊपर?”

“वॉलेट भूल गया था, वही लेने गया था। अरे वो सब छोड़ो ये बताओ मक्खन भैया को कुछ दोगी? याद है हमने कहा था चाहे भैय्या जिसका भी हो पहले, दोनों ही आएंगे मिठाई लेकर…”

“हाँ याद है, लेकिन फिर तुम अकेले क्यों जा रहे थे?”

“बोला तो हमने सोचा मैडम अफसर बन गयी है, कहाँ याद रखेंगी हमको और फिर मक्खन सिंह जैसों को ही उजाड़ने की सरकार तुमको अब तनखाह देगी! हा हा हा हा…”

“अच्छा ऐसी हूँ मैं? तुमको तो भले याद न रखूँ पर मक्खन को कैसे…? वहीं तो मुझे तुम मिले थे, मेरे गदहा प्रसाद। ही ही ही ही।”

“अरे बताओ कुछ ले लू यहीं मुखर्जी नगर से?”

“क्या लोगे”

“अरे कुछ भी मीठा, मेरठवाले से…”

“आशु मैंने तो ना कुछ और सोचा था… सरवना भवन चलेंगे, उनको लेकर सी पी वाले। क्यों?”

“हाँ ठीक है, पर वो दुकान छोड़ के जाएंगे?”

“पता नहीं पर ट्राई करने में क्या जाता है?”

“हम्म्म्म्म!! अब पार्टनर बोल दिया है तो देख लेंगे।”

“हाँ देख लेंगे। ही ही ही ही…”

दोनों चुपचाप मेट्रो की तरफ जाने लगे। खुश हैं दोनों आज। अशोक को दो साल हुए लखनऊ से आय और मोशी को करीब ढाई-पौने तीन साल। दोनों लखनऊ के ही हैं। एक सरोजनी नगर की तो दूसरा गोमती नगर का। दोनों के परिवार संपन्न। एक जात, सब मस्त। भला-चंगा। अशोक इंजीनियर है और मोशी लखनऊ यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य में मास्टर्स। दोनों शांत से मेट्रो में बैठे चले जा रहें हैं। मोशी अशोक के बारे में सोच रही है और अशोक मोशी के बारे में।

लग ही नहीं रहा जैसे कल ही यूपीएससी का फ़ाइनल रिज़ल्ट आया। मोशी को आई ए एस मिल जाएगा। किस्मत अच्छी हुई तो यूपी कैडर भी। मिल ही जाएगा किस्मतिया तो अच्छी है ही इसकी। सोचता सोचता अशोक उसके जाने की तैयारी, फलाना-ढिकाना से होता हुआ, उसके ट्रेनिंग पर जाने तक आ गया। अभी मई है… जून, जुलाई, अगस्त… तीन महीना है। फिर ये चली जायेगी और मैं अकेला हो जाऊंगा। उधर मोशी भी सब कुछ सोचते सोचते सितम्बर की जॉइनिंग तक आ गयी। एक तीखी उदासी दोनों के चेहरे पे छा गयी। एक दूसरे की ओर देखा और समझ गए की क्या चल रहा है। मोशी की तो आखें डबडबा सी गयी।

फिर सोच में डूबे दोनों पता नहीं कहाँ खो गए। मोशी सोच रही है कि अशोक का भी होता तो कितना अच्छा होता। साथ साथ लॉब्सना जाते… मसूरी… वाह! हलकी-सी मुस्कान दौड़ गयी। लेकिन फिर वही कि अकेले जाना है। और उधर अशोक के दिमाग में कुछ और ही चल रहा है। वो मसूरी नहीं लखनऊ पहुंचा हुआ है। पता नहीं मेरा हुआ नहीं, इसकी वजह से इसके माँ-बाप शादी के लिए मना न कर दें। अब कितना भी जल्दी हुआ मेरा, तब भी डेढ़ साल तो मान ही लो। डेढ़ साल रुकेंगे इसके घर वाले? बाप तो वैसे भी इसका हरामखोर कम नहीं। वो तो माँ है, जो मुझे पसंद करती है। बहुत गहरा उतर गया था अशोक, एक दम शून्य। ब्लैंक…।

इतने में मोशी उसका हाथ हिलाती है। उठो राजीव चौक आ गया। दोनों मेट्रो से बाहर निकलते हैं। अशोक आगे आगे ब्लू लाइन की तरफ बढ़ा। पीछे से लगभग भाग कर मोशी उसको पकड़ती है, “यार तुम इतना दूर दूर क्यों भाग के चलते हो? ऐसे तो मेरे मम्मी पापा, इस उम्र में, रात को वाक पर निकलते हैं।”

“अच्छा अच्छा, पापा पुराण छोडो और चलो, भीड़ थी इसलिए आगे निकल गया। अगल बगल तो चल नहीं सकता।”

“हाँ पता है कितनी बड़ी भीड़ है। अच्छा सुनो, मुझे सीपी जाना है।”

“क्यों अब क्या हुआ? यार पहले मक्खन के पास चलो…”

“अरे बाबा हम उनके लिए ही एक शर्ट लेने जा रहे हैं।”

“सीपी पे? मक्खन की शर्ट? पगला वगला गयी हो क्या” उतने पैसे दे देना उसके कुछ काम आएंगे। वो क्या करेगा इतनी महंगी शर्ट पहिन कर?”

“करेगा क्या! वही जो तुम करते हो… चमक के घूमेगा, अपनी मईडम के साथ। खी खी खी खी।”

“बकवास करवा लो तुमसे बस!”

“अच्छा चलो।”

दोनों चलने लगे मेट्रो गेट के बाहर की ओर। बाहर निकलते ही मोशी ने कुछ देर सोचते हुए से पूछा, “यार तुम मेरे पापा से इतना चिढ़ते क्यों हो?”

“कौन चिढ़ता है? मैं?”

“नहीं, मक्खन सिंह! तुमसे बात कर रही हूँ न? इतने सालों में इतना तो समझ ही गयी हूँ की तुम कैसे मुझे चिढ़ाते हो और कैसे मुझे खिजाते हो या कैसे खुद खीजते हो, गुस्सा होते हो। अब बात न बदलो, कायदे से बोलो।”

“चिढ़ता नहीं हूँ। चिढ़ुंगा क्यों? उन्होंने कौन-सी मेरी बेटी भगा ली है? हा हा हा हा! बेटी तो उनकी मैं भगाऊंगा। चिढ़ता नहीं हूँ बेटा, बस थोड़ा सा उनका एटीट्यूड मुझे नहीं पसंद। हमेशा ऐंठे ऐंठे से रहते हैं। जैसे पता नहीं किस बात का नाज़ है। अब देखो! घमंड नहीं बोला है। चढ़ मत जाना। तुम्हारे साथ रहकर इतना साहित्य तो मैं भी सीख गया हूँ कि उर्दू का नाज़ और हिंदी के घमंड में किसका भाव क्या है? क्यों?”

“हाँ ठीक है। वैसे ऐसा हैं नहीं आशु। पापा शुरू से नहीं थे। मुझे बचपन याद है अपना, जब मैं छोटी ही थी, इन फैक्ट, बारहवीं तक भी वो बड़े जॉली किसम के थे। उन्होंने मुझ पर या मीशू पर शायद ही कभी हाथ उठाया हो। वो तो तुम्हारे बारे में, जब से पता चला है, तब से थोड़ा मुझसे भी रूड हो गए हैं। अब शायद घर जाऊँ तो ठीक हों। उनको लगता था कि उन्होंने मुझे पढ़ने भेजा था। तुम्हारे साथ घूमने नहीं। पर शायद वो ये न समझ पायें कि अगर तुम ना होते तो मुझे इस दिल्ली में यूपीएससी से लड़ने में नानी याद आ जाती। अब तो बस, इस बार तुम्हारा हो जाय सेलेक्शन, बस। बस तुम थोड़ा अपनी स्टडी जनरलाईज़्ड कर दो। तुममे और मुझमे यही फरक है की तुम बहुत स्पेसिफिक हो जाते हो। स्टूडेंट और प्रोफ़ेसर की कॉपी में कुछ तो फर्क होना चाहिए न?”

अशोक बड़े गंभीर होकर सुन रहा था, बोला, “यार तुम तो अभी से अफसर टाइप साउंड करने लगी। मेरी पढ़ाई की छोडो…” “नहीं छोडो क्यों?” मोशी बीच में तपाक से बोली।

“यार मोशी मैं इस पर बहस नहीं चाहता। मूड अच्छा है और रूम तक पहुँचने तक अच्छा रहने दो। अपना भी और मेरा भी। और रही बात तुम्हारे पप्पा जी की तो किसी को पसंद न करने का ये मतलब कतई नहीं की आप उससे नफरत करते हैं। जिस दिन वो मुझसे सीधे मुँह बात करने लगेंगे, उस दिन मेरी भी समझ उनके लिए शायद बदले… और शायद ना भी बदले। लेकिन मुझे किसी पागल कुत्ते ने नहीं काटा है की ऐसे किसी को पसंद या नापसंद करता घूमू। हुह्ह्ह!! कर लिया न मूड खराब ?? यार तुमसे कितनी बार कहा है, अपने पप्पा की बात तब किया करो, जब उनकी कोई बात चले। बिना बात क्यों?”

“मैंने नहीं तुमने बात शुरू की उनकी। मोशी गुस्से में बोली। तुमने नहीं कहा पापा पुराण बंद करो। अब मैं अपने पापा को याद भी करूँ तुम्हारे सामने तो वो पुराण हो जाएगा?”

“मैंने कब कहा? और अगर कहा भी तो मज़ाक में कहा। अच्छा छोड़ो, शर्ट लो और चलो। देखो कितनी दूर आ गए। अब यहाँ से ऑटो से चलेंगे। मेट्रो से मक्खन तक बहुत धूप लगेगी। क्यों?” अशोक ने बात संभालते हुए कहा।

लेकिन मोशी का मुँह बन गया था। अशोक से पहले ही थे उसके पापा, आज भी। दोनों दुकान गए और एक बढ़िया सी नीले और सफ़ेद चेक की शर्ट ख़रीदी, पैक करायी। मोशी तो उसकी बीवी, जो गाँव में रहती थी, के लिए भी कुछ लेने वाली थी पर अशोक ने झिड़क दिया। अबकी बार बात मोशी ने सँभाली और बिना कुछ बोले उसके लिए कुछ पैसे रख देने की तय हुई। सुलह हुई। और दोनों मदर डेरी से मैंगो आइसक्रीम लेकर ऑटो में बैठ गए। और चल दिए अपने मक्खन भैय्या के पास।

मक्खन ने उनसे बिना पूछे ही कांच के गिलास में चाय बढ़ा दिए थे।

“अरे नहीं मक्खन, मोशी अब अफसर बन गयी है। अब तुम्हारी चाय काहे पियेगी ये। आज सीसीडी में कॉफी पिलाएगी कॉफी। तुम आज रहने दो।”

मक्खन को 12 रुपये की बिक्री की चिंता नहीं थी। हुलसकर कहा, “अच्छा माने इहौ अफसर बिटिया! वाह भइया, हमरा चाय पीके बिटिया अफसर बन गई है, इससे खुश की बात औ क्या हो सकत है… अच्छा तो है, एक-एक करके सब हमरी चाय पीके धीरे-धीरे सीसीडी में घुस जाते हैं। औ तुमरा क्या हुआ भइया, तुम कब घुसोगो सीसीडी में?”

मोशी के यूपीएससी में होने की खुशी के बीच मक्खन का ये सवाल इतनी तेजी से घुलकर उदासी में तब्दील हो जाएगा, अशोक इसके लिए तैयार न था। मोशी माहौल को हल्का करना चाहती थी, “अरे मक्खन भइया, पहले तो ये लो देखो हम लोग आपके लिए क्या लाए हैं और आपकी उनका नाप वाप पता नहीं था, पैसे रखें हैं इसमे उनके लिए बढ़िया साड़ी खरीदवा दीजियेगा और आज आप भी चलो न हमारे साथ सीसीडी। पहले एक काफ़ी पीते हैं फिर तीनो के तीनो चलेंगे बढ़िया डोसा खा के आएंगे।”

अब तक तो आस पास के दूकान वाले भी इंटरेस्ट लेने लगे। ख़ैर उधर ख़ुशी से मक्खन छाती फूल गयी। बोला, “हम? अरे… धत्त … बिटिया… हम आप दोनों के बीच जाकर क्या करेंगे, उहां आप जाइए, आराम से सोफा में धसिए औ अशोक भइया से पूछ-पूछके शक्कर डालिए, औ काफी बनाइए!”

“अबे तो तुम आज तक यहां क्या करते थे हमारे बीच?” अशोक बोला। “हियां? हियां चाय ढारते थे, औ अशोक भइया और बिटिया के आंखों के बीच की आवाजाही देखते थे… पवन चक्की जैसी फुक्क-फुक्क आती-जाती नजरें, सैइकिल जैसी टकरातें नजरे देखते थे और भीतरे-भीतर आशीष देते थे कि दुनहुं का एके साथ कुछ हो जाए”

ओह मक्खन भइया, कमऑन… अब तुम भी कविया गए।” मोशी शर्माती हुई बोली। “काहे, आप ही तो भैय्या को हियें बैठा बैठा के महीना का महीना पिरेमचंद से रेनु, निराला, शमशेर का खिस्सा-चर्चा करके हमरा भेजा निचोड़ती थी। दुनहुं मिलके त उस समय नहीं समझ आता था कि मक्खन भइया को कुछ बुझाता है भी कि नहीं?”

“हम तुमको बहुत मिस्स करेंगे मक्खन भइया! चलोगे हमारे साथ जहां पोस्टिंग होगी?” मोशी याचना से बोली।

“हमको छोडिए अशोक भइया को लेले जाइए… उ आपके बिना तैयारी करेंगे… हहरके मर जाएंगे इ राजिंदर नगर औ मुकरजी नगर के जंगला में!”

“क्यों अशोक? तुम क्यों चुप्प हो?”

“कुछ नहीं मोशू, सोच रहा था तुमने आज पहली बार खुद से मुझसे गिफ्ट मांगा है, क्या दूं?”

मोशी बोली, “अच्छा, तुम… तुम, मुझे मक्खन भइया की इस दूकान का एक टुकड़ा दे दोगे? सरकारी क्वार्टर की ड्राइंगरुम में बहुत खूबसूरत लगेगी… है न? …हमारे रोज मिलने की जमीन… तुमको नज़र भर भर देखने की ज़मीन… सपने बुनने की जमीन और सबसे बड़ी… तुमको पाने की ज़मीन…”

मक्खन भैय्या बस आशीष की मुद्रा में खड़े दोनों को वापस जाते देखते रहते हैं।

किसी ने लाईक किया इतना पुराना पोस्ट तो हमने रीपोस्टकर दिया। जय बाबा विश्वनाथ की !!

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